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कोलारस विधानसभा: राजनीति, सत्ता और जनता के बीच खोता भरोसा

2026 मैं संभावित परिसीमन के इंतजार मैं दिग्गज

कोलारस विधानसभा का राजनीतिक परिदृश्य आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ विकास की घोषणाएँ तो हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई सवालों के घेरे में है। पिछले कुछ वर्षों में यह क्षेत्र राजनीति के केंद्र में कम और प्रशासनिक उदासीनता, संसाधनों की लूट और जवाबदेही के अभाव का उदाहरण अधिक बनता जा रहा है।
विधानसभा क्षेत्र में सत्ता का संतुलन भले ही स्थिर दिखाई देता हो, लेकिन जनता के मुद्दे अस्थिर और उपेक्षित हैं। सिंध नदी से अवैध रेत खनन, जंगलों की कटाई, पंचायतों में फैला भ्रष्टाचार, शासकीय भूमि पर अतिक्रमण, बिना मान्यता चल रहे स्कूल, गाँव–गाँव शराब की खुली बिक्री और हाइवे पर नशीले पदार्थों का कारोबार — ये सभी मुद्दे किसी विपक्षी दल की कल्पना नहीं, बल्कि आम नागरिकों की रोज़मर्रा की चिंता हैं।
राजनीतिक दलों की भूमिका केवल चुनावी भाषणों तक सीमित होती जा रही है। चुनाव के समय जनता को विकास के सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही सत्ता और व्यवस्था के बीच एक अदृश्य गठजोड़ काम करने लगता है, जिसमें सबसे कमजोर कड़ी आम नागरिक बनता है।

कोलारस विधानसभा में यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि बड़े राजनीतिक नामों की मौजूदगी खबर तो बन जाती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। क्षेत्र दौरे, शिलान्यास और उद्घाटन सुर्खियाँ तो बटोरते हैं, परंतु पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार, तहसील में भूमि घोटाले और पुलिसिया मनमानी पर चुप्पी बनी रहती है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता, लेकिन दुर्भाग्यवश आज सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें होती हैं। यही कारण है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच जनता का भरोसा कमजोर पड़ रहा है।*
*कोलारस विधानसभा को आज किसी नए नारे की नहीं, बल्कि ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति और जवाबदेह शासन की आवश्यकता है। जनता अब सिर्फ यह जानना चाहती है कि —
सिंध नदी के संसाधनों की रक्षा कौन करेगा?
पंचायतों में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई कब होगी?
शासकीय भूमि पर कब्जों से किसे संरक्षण मिल रहा है?
युवाओं को नशे की दलदल में धकेलने वालों पर लगाम कौन लगाएगा?*

कोलारस हलचल का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती सत्ता की चुप्पी से नहीं, बल्कि सवालों की गूंज से आती है। यह संपादकीय किसी व्यक्ति, दल या पद के विरुद्ध नहीं, बल्कि जनहित में जवाबदेही की माँग है।
जब तक जनता के सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक यह हलचल जारी रहेगी।*
— संपादकीय
कोलारस हलचल

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